Sunday, June 7, 2020

फेसबुक-पेज-साप्ताहिक विवरण

'सहारा'-राजेन्द्र पुरोहित/प्रस्तुति एडमिन/अभिलाष दत्ता
           बंसी का लटका चेहरा बता रहा था कि सेठ जी ने जवाब दे दिया है। लच्छो रुआँसी हो गयी। धीरे से बोली,"चलना पड़ेगा ना हमें भी? मुंबई से गाँव तक पैदल कैसे चलेंगे? फिर मुन्ना भी तो साथ है।"
                    बंसी की आँखें भर आईं, भरे गले से बोला,"मालिक का काम भी तो बन्द है। जब चला, तो तनख्वा-बख्शीश सब दिया। अब धंधा नहीं, तो कैसे देंगे?" भारी मन से दोनों ने सामान बाँधा और कुछ खाने का सामान भी ले लिया। मुन्ना को गोद में उठाये रवाना होने लगे, तो लच्छो की रुलाई फूट पड़ी।
        बंसी ने समझाया,"रो मत पगली। जिसने ये दिन दिखाये, वो ही इन्हें दूर करेगा।" सामने एक टोली जाती दिखी, तो दोनों ने कदम बढ़ाये ही थे कि सामने सेठ व सेठानी को देख कर ठिठक गये।
                   बंसी ने अचरज से पूछा, "सेठ जी आप?"
से जी ने कहा,"तूने ठीक कहा बंसी। जिसने कष्ट दिये, वही इन्हें दूर भी करेगा। तुझे मना करने के बाद मुझे बहुत दुःख हुआ। तकलीफ़ में बेसहारा छोड़ना तो नीचता होती।"
        सेठानी ने बात पूरी की,"धंधा नहीं है तो क्या, तनख्वाह बाद में दी जा सकती है। लेकिन दो जून की रोटी की तो कोई कमी नहीं। मत जाओ। आज नहीं तो कल धंधा चालू हो ही जायेगा। इतने वर्षों का साथ है, ऐसे मझधार में कैसे छोड़ दें, तुम दोनों को। जा री लच्छो, सामान अंदर रख दे और मुन्ना के लिये दूध ले जा आ कर।" बंसी भीगी आँखों से आसमान की तरफ़ देखने लगा।

'उम्र के रास्ते'-अमृता सिन्हा/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्त
 
उम्र के रास्ते गुज़रते
जाने कब, क्या-क्या
पीछे छूटता गया...!
वहीं तो खड़े हैं अब भी,
वो दरो-दीवार।
लेकिन खो गयी तो सिर्फ़
मेरी वो खिड़की, और
उस खिड़की से झांकता
एक टुकड़ा आसमां।
जाने कहाँ रह गयी
बारिश से भीगी शामें।
वो ठंडी सुहानी हवा,
साँसों में उतर आती
वो मिट्टी की ख़ुशबू।
अंधेरो में टिमटिमाते
ख़्वाहिशों के जुगनू,
वो तन्हाई की महफ़िल।
और पहरों की सुख़न,
हर आह पे दिल की
बे-बात ही चुभन।
जाने कहाँ खो गया
ज़िंदगी का वो हर लम्हा,
अब तो हर पल, उम्र
यूँ तमाम हो रही है।
किसे ख़बर, कब सुबह
कब शाम हो रही है !!

'मीरा'-श्रुत कीर्ति अग्रवाल/प्रस्तुति- एडमिन अभिलाष दत्ता
शुरुआत में, जब उसके देह का आकर्षण सर चढ़ कर बोलता था तब उसको अपनी पत्नी होने के बावजूद, कुछ संयुक्त परिवार के सैकड़ों बंधनों और कुछ उसके मितभाषी स्वभाव के कारण उसे उससे मिलने-बतियाने के अवसर थोड़े कम ही मिला करते थे।  फिर जब बच्चे बड़े होने लगे, वे हर महीने खर्च के लिये उसके हाथ में पैसे पकड़ाते हुए पता नहीं कब घर के वो रोबदार मुखिया बन गया जो हर समय अत्यंत व्यस्त रहता था और घर के लोगों से बराबरी के स्तर पर बात करना उसकी शान के विरुद्ध था। 
        वो तो अब सेवा-निवृत होने के बाद, जब जीवन में साँझ गहराने लगी है, उसको अपनी मीरा और बच्चों पर ध्यान देने का समय मिला है। अब उसको याद आया है कि वह कम भले ही बोलती हो, पर न कभी झूठ बोलती है और न सच बोलने से डरती है। वो सारे दिन कड़ी मेहनत करती है पर शिकायत कभी नहीं करती और सबसे बड़ी बात... बिना उससे कोई खास मदद माँगे, अकेले अपने दम पर उसने परिवार और बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ सँभाल लीं थीं  और जब तक उसका ध्यान इस तरफ जाता, सबके सब अपने-आप में व्यस्त हो चुके थे।
       धर वो महसूस करने लगा है कि वो तो अपनी मीरा से बहुत प्यार करता है, उसका साथ चाहता है और उसको खोने से उसको डर लगता है। अब अफसोस होता है कि उसने अभी तक इस प्यार को कभी जताया क्यों नहीं? उसके लिये कभी कुछ किया क्यों नहीं ! मानसिक तौर पर उन दोनों के मध्य इतनी दूरी क्यों है?
     सका हाथ पकड़ कर बैठा लिया था उसने और आँखों में आँखें डाल कर पूछा था... "तुमने आजतक कभी मुझसे कुछ नहीं कहा! आज हमारी शादी की सालगिरह के दिन मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे कुछ माँगो।"
     अविश्वास भरी नजरों से उसको देख रही थी पर जब वो इसरार करते ही रहा तो बोली,"साकेत भवन के पीछे वाले कमरे में जो सदानंद बाबू रहते हैं, वो आजकल बहुत बीमार रहने लगे हैं। उनके इस आखिरी समय में मैं उनकी सेवा करना चाहती हूँ।"
            चौंक उठा... "वो बूढा? आधा पागल? तुम भला उसे कैसे जानती हो?"
थोड़ा हिचकिचाई जरूर थीं मीरा, पर उसे मिथ्या बोलना कहाँ आता था... "वह हमारा पड़ोसी था! हम आपस में शादी करना चाहते थे! मेरी वजह से ही उसकी ये दशा हुई है।"
पता नहीं कब, उसके हाथों पर से उसकी पकड़ ढीली हो गई थी।

"ग्रीष्मऋतु"-अंकिता कुलश्रेष्ठ/प्रस्तुति - एडमिन - अभिलाष दत्ता

शुष्क,तपता वसुधा का गात
बरसती अग्नि झुलसते पात
लुप्त सा जीवन का उल्लास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास
रक्तवर्णी मुख मंडल तप्त
दहकते नख-शिख-केश-कपोल
म्लान उर मुरझाए ज्यों पुहुप
सुलगते गोरी के मधु बोल
हृदय प्रियतम का हुआ उदास।
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
ओढ़कर धरा हुई बेहाल
धूप की चादर चारों ओर
कर रहे पावस का आह्वान
टिटहरी दादुर मोर चकोर
क्लांत सब प्राणी करते आस
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
डगर सूनी हैं सूने खेत
गगन से टपक रहे अंगार
ताल में करते बाल किलोल
ताप का प्राकृतिक उपचार
मद भरा रवि का अट्टहास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
दिवस यों बीतें,लगें पहाड़
स्वेद तर व्याकुल आकुल देह
पुष्प मुख उतरे उपवन शांत
तितलियाँ,कोयल बैठीं गेह
लुप्त कलियों अलियों का हास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
आम ककड़ी खीरा तरबूज
ग्रीष्म के शीतल ये उपहार
कुंभ-जल लगता जैसे सोम
लपट सी लगती गर्म बयार
स्वप्न दुर्लभ लगता मधुमास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
चले नानी-नाना के गाँव
ग्रीष्म अवकाशों का आनंद
बालकों का मनभावन माह
लग रहे ग्रीष्म थपेड़े मंद
गगन में तारे थाल बतास

ग्रीष्म ऋतु का आया है मास

"देशहित"-डॉ. पूनम देवा/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता
“माँ!  मैं आ गया हूँ ,दरवाजा खोल।” खट-खट की आवाजें माँ के कानों पर हथौड़े  सी पर रही थी।
माँ ने अपनी बेचैनी‌ पर  काबू  रख‌ कर कहा -  “बेटा पहले तुम चौदह दिनों के लिए सरपंच जी के बनाए क्वारंटाइन-सेंटर में चले जाओ। उसके बाद हीं मैं तुम्हें घर में आने दूंगी”।
“माँ मेरा  तो जगह-जगह टेस्ट हुआ है, और मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ।
“ना बेटा  ना, तू मुम्बई से आ रहा है, सुना है सबसे ज्यादा लोगों को यह कोरोना बीमारी वहीं लगी हुई  है। इसलिए सरकार ने जो नियम बनाए हैं,  तू भी पहले उसका पालन कर लें। चौदह दिनों के बाद ही मैं तुम्हारे लिए इस घर के दरवाजे खोलूँगी।
माँ से मिलने को व्याकुल मन, पर धैर्य रख बेटा विद्यालय की ओर बढ़ गया। पढ़ें-लिखे बेटे को अपनी असाक्षर माँ पर गर्व हो रहा था कि आज  उसकी माँ ने पुनः एक सुन्दर सीख दी है ‘जागरूकता की ओर देशहित की। आज समय की यही तो माँग है, हम सब जागरूक रहें और अपने से ज्यादा देशहित को प्रार्थमिकता दें

विनती-मधुरेश नारायण/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता

यूँ मिटते अपनी रचना को तो तुम देख नहीं सकते।
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
बड़े जतन से की है तुमनें इस सृष्टि की रचना।
सदा चलायमान,रहे बदलती इसकी संरचना।
कहाँ दानव कहाँ मानव,ऐसा तुम देख नहीं सकते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
ये सृष्टि फल-फूल रही यहाँ पे युगों-युगों से रब।
कभी जलजला कभी सुनामी,बनते दानव जब तब
सदा मानव विजयी रहा,पीठ पर तुम,सभी कहते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
विकराल रुप धर के दानव फिर आया इस धरा पर
विकल है मानव इसके चंगुल से छुटने को,जहाँ पर
सृजन को बचाने आओगें तुम,  इंतजार  करते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।

मजदूर"-सुधा पाण्डेय/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता

मजदूरों की जिन्दगी,
लगती कितनी दरिंदगी,
बन्धी हुई है डोरों में,
डोर है जड़ से जुड़ी।
देखा! मजदूरों को,
अपनी कहानी कहते हुए,
बिना जुबाँ के सहते हुए,
रास्तों को तय करते हुए,
अपनों से बिछुड़ते हुए।
अपने गाँवों को छोड़,
चले थे काम खोजने,
चलते रहे हर दिन,
दूरियाँ तय करते रहे,
मंजिलें तलाशते रहे।
खाने को रोटी नहीं,
जो था,वह खत्म हुआ,
कल के लिए मन में सोचा,
थके पाँव मन को कोसा।
भूखे-प्यासे निकल पड़े,
मंजिल तक पहुंच सके,
राह में कई बिछड़े राही,
छोटी साहस दिखा गई,
बापू को घर पहुँचा गई
यह था दो पहिए का कमाल,
बाहदूरी का था मिसाल,
भारत माता की जय,
जय भारत,जय हिन्द ,                   

का नारा  वह लगा गई।

"अजीब है जिन्दगी"-उर्मिला वर्मा/प्रस्तुति एडमिन मधुरेश नारायण

कभी अजीब अकुलाहट दिल में उभरती है।
मैं गहराई में जाना चाहती हूँ।
जाने कब-कौन-कहाँ किस ओर मिल जाये।
कदम-कदम पर चौराहे मिलते,
और हर दिन मिलती सौ राहें,
बाहें पसार इन्तजार करती
शाखा-प्रशाखाएं निकलती रहती हैं।
नए-नए  रूप के अनेक विषय हर दिन मिलते हैं।
चौराहे पर खड़े हो कर कुछ बातें करती हूँ।
...बस!उपन्यास बन जाते हैं...।
अलंकार-विश्लेषण, चारित्रिक-व्याख्यान, दुखों की कथाएं,
तरह-तरह की शिकायतें, जमाने की
जानदार सुर सुनने को मिलते हैं।
घर में भी पग-पग पर चौराहे मिलते बाहें फैलाए..,
हर दिन मिलती सौ राहें,
मैं सबों से गुजरना चाहती हूँ
उनके तजुर्बे और मेरे स्वप्न सब सत्य लगते रहते।
ऐसा जान पड़ता प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीड़ा।
पल भर में मैं सबों से गुजरना चाहती।
सबों के ह्रदय पटल में बसना चाहती।
सब तरफ अपने को लिए फिरती रहती।
और मजा तब आता जब मैं ठगी जाती हूँ।
अजीब है यह जिन्दगी।
मैं सोंच रही हूँ,
अपने जीवन की कुछ गाथा लिखूँ।
विषयों की कोई कमी नहीं,
बस ठीक चुनाव ही नहीं कर पाती हूँ!


प्रस्तुति :: मो. नसीम अख्तर

  जो संस्था के सदस्य नहीं हैं ऐसे किसी साहित्यकार या कवि की कोई रचना उनके परिचय के साथ लेख्य-मंजूषा के पेज पर पोस्ट किया जाएगा, ताकि सदस्यों को कुछ जानने एवं सीखने का मौका मिले।
      इस कड़ी में आज पेश है देश की मशहूर उपन्यासकार, लेखिका और कवियत्री आशा प्रभात जी के संक्षिप्त परिचय के साथ एक कविता।
       मोहतरमा आशा प्रभात जी का जन्म 21 जुलाई 1958 को बिहार के नरकटिया बाजार, पूर्वी चंपारण ज़िला में हुआ।लेखन में ये हिन्दी एवं ऊर्दू में समान रूप से अधिकार रखती हैं।इनकी रचनाओं का प्रकाशन न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी हिंदी - ऊर्दू के स्तरीय पत्र पत्रिकाओं निरंतर प्रकाशित होता रहा है तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित भी होता रहता है।
प्रकाशित कृतियाँ -
*हिन्दी एवं ऊर्दू में 16 पुस्तकें।
*पाँच उपन्यास "धुँध में उगा पेड़"   " जाने कितने मोड़ " "मैं और वह" "गिरदाब " और "मैं जनक नंदनी"।
 *चार कहानी संग्रह, दो काव्य संग्रह।कई किताबें हिन्दी से ऊर्दू एवं ऊर्दू से हिन्दी में अनुवादित।उपन्यास "मैं और वह "हिन्दी, उर्दू के अलावा तेलगु में अनुदित व प्रकाशित ।कहानी "एक्वेरियम " भारत के मान्यता प्राप्त लगभग सभी भाषाओं में प्रकाशित। चर्चित उपन्यास "मैं जनक नंदनी" पर कई विश्वविद्यालय में विधार्थीयों द्वारा शोध किया गया।आइ.ए.एस के प्रश्न पत्र में दो बार रचनाओं को स्थान प्राप्त।
म्मान एवं पुरस्कार -
दरीचे के लिए 'काव्य संगम पुरस्कार '। धुँध में उगा पेड़ के लिए 'प्रेमचंद सम्मान। राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा' 'साहित्य सेवा सम्मान' । दिनकर सम्मान। बिहार ऊर्दू अकादमी द्वारा 'सुहैल अज़ीमाबादी अवार्ड व खसूसी अवार्ड '। ए.बी.आई द्वारा 1998 वुमन आॅफ द इअर अवार्ड एवं दर्जनों राष्ट्रीय अवार्ड।
       पेश है उनकी एक बेहतरीन और लोकप्रिय कविता।

"मेरी बच्ची!"
                                         
मेरी बच्ची !
जिस दिन से
मेरी कोख में
तुम्हारी साँसों ने
धड़कना शुरू किया है
कुछ लोगों की नींदे
उड़न छू हो गयी हैं
क्या गज़ब की बात है
इक्कीसवीं सदी में जीने
और चाँद, तारों तथा
मंगल ग्रह तक को
रौंदने वाला इंसान
तुम्हारे नन्हें से वजूद से डर गया है
अंधेरे कमरों में हो रही है
तुम्हें मिटाने की साजिशें
तुम्हारे दादा,ताऊ और पिता
आंँखे बंद किये सोचों में गुम हैं
शायद उनकी बंद आंँखो में
स्वर्ग न पहुंँच पाने का
भय व्याप्त है
या फिर तर्पण बगैर
सूखता गले का डर
पर मेरी बच्ची!
उनके स्वर्ग की तमन्ना पर
तुम्हें मिटा कर
मैं नर्क की यातना नहीं झेलूँगी
तमाम विरोधों के बावजूद
मैं तुम्हें जन्म दूंगी और
इस धरती पर तुम्हें
परवान चढ़ने का अधिकार  भी ۔۔۔।


"धरोहर"प्रस्तुति :: मो. नसीम अख्तर

जैसा कि आप सभी सदस्यों को जानकारी है  कि प्रत्येक शनिवार को भारत के किसी दिवंगत साहित्यकार या कवि की कोई रचना के साथ उनके बारे में विस्तृत जानकारी लेख्य-मंजूषा के पेज पर पोस्ट की जाती है। इस कड़ी में आज पेश है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता के साथ उनके बारे में विस्तृत जानकारी। 
         'दिनकर' जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से 1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।
        त्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से भी सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।
         न्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे। द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध-काव्य कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया।
         उनकी प्रसिद्ध रचनाएं उर्वशी, रश्मिरथी, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, हुंकार, सामधेनी, नीम के पत्ते हैं.
         उनकी मृत्यु 24 अप्रैल 1974 को हुई ।
            ✒️कलम या कि तलवार⚔️

दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार 
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार
अंध-कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, 
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली 
पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, 
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे 
एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी, 
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी 
जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले, 
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले 
जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार, 
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार
     अगले शनिवार एक नये साहित्यकार /कवि के साथ पुन: हाज़िर रहूँगा। 

     


अक्षर अंगारे, शब्द ज्वाल,
स्वर टंकार, भयभीत काल।
प्रकम्पित-से, पर्वत गह्वर,
प्रवहमान कविता निर्झर।
रामेश्वरम का सागर तट,
उड़ेला रश्मि रथी का घट।
उछली उर्मी, उल्लसित धार
पुलकित पयोधि, न पारावार।
अहके अर्णव, क्या दूँ मैं वर?
करबद्ध कोविद, कहें कविवर।
थाम जलधाम, ये शब्द वीणा
मृत्यु दक्षिणा, मृत्यु दक्षिणा!
नि:सृत नयनन, नीरनिधि नीर
उठे उदधि उर लिए चीर।
मुख लाल क्षितिज किये रत्नाकर
समेटे रश्मि, डूबे दिवाकर।
कालजयी कवि अजर-अमर
नमन दिनकर, नमन दिनकर


4 comments:

  1. सुंदर संयोजन। खासकर रचनाकारद्वय की जानकारी से आनंदित हुई। दिनकर की कई कविताएँ मानसपटल पर आ गयीं। वर्तमान में जब चीन भारत को आँख दिखाने की हिमाकत कर रहा है तो स्वाभाविक रूप में कर जी की 'परशुराम की प्रतीक्षा की स्मृति जीवंत हो उठी, जो उन्होंने 1962-63 में चीन के हाथों भारत को मिली पराजय से तिलमिला कर लिखी थी और मातृभूमि के प्रति भारतीयों को सजग-जागरुक करने के लिए लिखा था।

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  2. इस ब्लौग मे समाहित काव्य-रचना और लघुकथा,
    सबके सब अच्छी हैं।
    काव्य रचनाओं और लघुकथा की मौलिकता अगर
    सूक्ष्मता से देखा जाये तो पाठक स्वतः समझ सकते है कि यह संकलन श्रेष्ठ है। लेख्य मंजूषा को इस परम्परा के लिए कोटि कोटि धन्यवाद।

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    1. हार्दिक आभार आपका

      कृपया अपना नाम लिख दें और मेल में भी जोड़ लें

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  3. बहुत सुंदर संकलन। पठनीय और संग्रहणीय।

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