वर्णों का जादू

वर्णों का जादू

Thursday, June 4, 2020

विश्व पर्यावरण दिवस पर वो बातें जो दिनचर्या में शामिल हैं



विभा रानी श्रीवास्तव: :माना घर के लिए जंगल कटा।
मनीप्लांट मुस्करा रहा,
नीम रोया छटपटा।
घर के सपनों से कालिमा हटा,
भाग्य से पन्ना बदला दीमक चटा।
वर्षों से ढूँढ़ रही हूँ,
एक परिवार में एक अंश पर
सबका विचार सिमटा।
माना घर के लिए जंगल कटा
माया शनॉय श्रीवास्तव: :आइये एक बात बताती हूँ
ध्यान से सुनियेगा चेताती हूँ
खाती अंडा नहीं उबालती हूँ
चौंक गये क्या, कच्चा चबाती हूँ ?

समय ,ईंधन ,जल बचाती हूँ
उबल रहे ग्रेवी में अंडा सजाती हूँ!
क्या आपके पास है कुछ ऐसा?
 ज्योति स्पर्श: :बिरयानी जब घर पर मंगाई
डब्बे को बिरयानी के की हमने सफाई
 फिर थोड़ी सी मिट्टी कर छेद दबाई
किसी डब्बे में लहसुन की कलियां
 तो किसी में धनिया प्याज हरियाये
यूँ थोड़ी प्रकृति रसोई की खिड़की पर उगाई।
 मीनू झा: :गर्म पानी का काम टंकी से चलाती हूँ
कुकर में ही अक्सर खाना पकाती हूँ
सब्जी के छिलकों की भुर्जी बनाती हूँ
बचे खानों को मैं मिट्टी में दबाती हूँ
 डॉ. पूनम देवा: :गमले में धनिया उगाती
खाने में उसको सजाती।
कुछ फूल गमले में लगाई
अपने घर मंदिर में चढ़ाई
 मोहम्मद नसीम अख्तर: :वर्षा की बूंदों को बचा कर
उसका पोखर बनाकर
हर घर पानी पहुँचा कर
करता मैं सपनो को
साकार, बोलिये इस पर
आप सभी का क्या है विचार।
 शाइस्ता अंजुम: :परिदों के हालात पूछो न हम से
किस बेदर्दी से उसने घोंसले उजाड़े हैं
चलो इस जमीं को रहने लायक बनाएँ
अपनी बालकोनी में पौधे लगाएँ
 पूनम कतरियार: :बालकनी के कोने में पड़े गमलें
बरगद की डाल लगा पूजते थें,
कभी अनार के बीज डाल देतें थें।
रुत बदलें, बरखा आई छमाछम,
घर-आंगन, बरसें मेंह झमाझम।
दूधमुंहें अंकुरण के नयनाभिराम!
मन- अंगना मुदित, खिलखिल जायें,
वह नन्हा- सा बिरवा, जो मुसकाये।
प्रियंका श्रीवास्तव: :सब्जी के छिलकों को काट
रखती हूँ डब्बों में बांट
पानी में उसको गला
मिट्टी में दबा करूँ सपाट।
उत्तम खाद बन आता
छिलका बेकार न जाता
कचड़ा कम निकलता
पर्यावरण  मुस्कुराता।।
 श्रुत कीर्ति अग्रवाल: :सब्जियों के छिलकों से बना के खाद
फूलों को गमलों में रोपने के बाद
सूरज की पहली किरण में मदमाई
कलियों ने बाँटे दिलों में आह्लाद
मिनाक्षी कुमारी: :बनाने से पहले दाल चावल देती हूँ फुला
कुकर में पकाकर इँधन लेती हूँ बचा,
गमले में उगा लेती हूँ धनिया पुदिना टमाटर
छिलकों को दबा मिट्टी में बनाती हूँ ऊर्वरक |
 मीरा प्रकाश: :प्लास्टिक के बर्तनों में ,
फूल -पौधे लगाती हूँ।
पर्यावरण को स्वच्छ रख कर,
मन ही मन मुस्काती हूँ।
राजेन्द्र पुरोहित: :जब करें दाढ़ी या मंजन
नल खुला न छोड़ें सज्जन
गर्मी में गाड़ी कभी न धोना
बाद में वरना पड़ेगा रोना
बूँद-बूँद पानी संरक्षण
आओ आज करें हम ये प्रण
सुधा पाण्डेय: :घर को गमलों से सजाया,
पुदीना उसमें उगाया,
धोये कपड़ों के पानी से ,
गमलों को पटाया
मधुरेश नारायण: :पत्नी बनाती सुपाचय खाना,रोज़ में खाता हूँ।
पर्यावरण पर नित्य नये  व्याख्यान सुनाता हूँ।
गमले में उसने तुलसी के पौधे लगा रखे हैं।
गौरैया और गिलहरी को रोज़ पानी पिलाता हूँ।
सीमा रानी: :नारियल पानी पीकर
उसमें तुलसी का पौधा लगाऊँ।
तोहफे मे तुलसी को देकर
उनके इम्यून सिस्टम को बढ़ाऊँ।

8 comments:

  1. बहुत सुंदर और पठनीय संग्रह।

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  2. और भी तरीके पढ़ कर पता हुए।

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  3. विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सभी रचनाकारों की कलम खूब चली.. सभी को शुभकामनाएँँ💐💐
    सुंदर सुरूचिपूर्ण प्रस्तुति के लिये आ०विभा दी को बधाइयाँ🌸🌸
    धन्यवाद

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  4. पर्यावरण दिवस पर स्तुत्य आयोजन। सभी को बधाई।

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  5. वाह , सुंदर संकलन!! 👌👌👌

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  6. आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 10 जून 2020 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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