वर्णों का जादू

वर्णों का जादू

Sunday, July 12, 2020

रविवार 12 जुलाई 2020 मासिक पद्य वर्चुअल गोष्ठी में



राहुल-जननि 1-20 का पाठ
यशोधरा/माँ/विभा : राहुल/ (संजय और विष्णु)–– द्वारा किया गया

लेख्य-मंजूषा की मासिक पद्य गोष्ठी में सदस्यों ने अपनी रचना के पाठ के स्थान पर वरिष्ठ साहित्यकारों की रचना का पाठ किया।
साहित्य 'सीपियाँ' , साहित्य 'वीथिका' , साहित्य 'सुधा' , साहित्य 'मंजरी' , साहित्यिक 'स्पर्श'
लेख्य-मंजूषा (साहित्य और समाज के प्रति जागरूक करती पंजीकृत संस्था) के उपर्युक्त पाँच समूहों के प्रतिभागियों ने धरोहर साहित्यकारों की रचनाओं का पाठ किया।
रविवार 12 जुलाई 2020 लेख्य-मंजूषा की मासिक पद्य गोष्ठी में इस बार सदस्यों ने स्व-सृजित रचना -पाठ के स्थान पर वरिष्ठ साहित्यकारों की रचना का पाठ किया और सभी समूह के नेतृत्वकर्ता से साहित्य से सम्बंधित सवाल भी पूछे गए..

1. साहित्य का क्या अर्थ है ? हिन्दी साहित्य का आरम्भ किस शताब्दी से माना जाता है?
अर्थात समाज का हित, 8वीं शताब्दी से
2. हिन्दी के प्रथम कवि कौन माने जाते हैं? चम्पू क्या है ?
3. क्या हर साहित्यिक कृति समाज को नई दिशा की ओर ले जाती है? साहित्यकार क्या हर कृति को लिखने से पहले यह सोच लेता है?
4.आधुनिक साहित्य में बढ़ती अश्लीलता के लिए कौन जिम्मेदार है?
5.क्या कारण है अपवाद छोड़ दें तो प्रायः लेखक अपना लेखन-कार्य काव्य की ही किसी विधा से करता है?


मंचीय अतिथि

योगेन्द्र प्रसाद मिश्र अर्थमंत्री, बिहार हिन्दी-सा.सम्मेलन; स्था.समिति सदस्य, हि.सा.सम्मेलन,प्रयाग
राश दादा राश'जीना चाहता हूँ मरने के बाद', फ़क़त अंदाज़ है जीने का, मुहब्बत में ज़हर पीने का,
कवि घनश्याम (मुल्यांकनकर्त्ता)
वो अपनी खामियों को ढांकता है
गिरेबां  में   हमारी झांकता  है
जिसे करना नहीं होता है  कुछ भी
वही  लफ़्ज़ों  की  गाड़ी हांकता है कवि घनश्याम
सतविन्द्र कुमार राणा  (मुल्यांकनकर्त्ता)
रविन्द्र सिंह यादव
कविवर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक लघु कविता-

प्यार : एक छाता
विपदाएँ आते ही,
खुलकर तन जाता है
हटते ही
चुपचाप सिमट ढीला होता है;
वर्षा से बचकर
कोने में कहीं टिका दो,
प्यार एक छाता है
आश्रय देता है गीला होता है।
-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना 

वाचन- रवीन्द्र सिंह यादव / नई दिल्ली

साहित्य 'सीपियाँ' (36.3/60/द्वितीय)(मुल्यांकनकर्त्ता)
विषय : किसान

राजेन्द्र पुरोहित, जोधपुर 👈 नेतृत्व
 किसान
मैथिलीशरण गुप्त
हेमन्त में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहाँ

उर्मिला वर्मा, कैलिफोर्निया
किसान
केदारनाथ अग्रवाल
इनका एस्थेटिक्स खेतों की धूल में गूंथ कर बना है।
 हम न रहेगें
तब भी तो ये खेत रहेगें,
इन खेतों पर धान लहराते ये शेष रहेगें।

कमला अग्रवाल, गुडगाँव
किसान
सत्यनारायण लाल
नहीं हुआ है अभी सवेरा
पूरब की लाली पहचान
चिड़ियों के जगने से पहले
खाट छोड़, उठ गया किसान

साहित्य 'वीथिका' (36/60/तृतीय)(मुल्यांकनकर्त्ता)
प्रसंग/विषय :  पावस/सावन


सुषमा खरे, जबलपुर
"एक बूँद"

ज्यों निकलकर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी
सोचने फिर फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।
     _अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔंध


पूनम (कतरियार ), पटना👈 नेतृत्व

'सावन'

झम-झम झम झम मेघ बरसतें हैं सावन के
छम छम छम गिरती बूँदें तरूओं से छन के
चम चम बिजली चमक रही रे उर में घन के
थम थम दिन के तम में सपने जगते मन के।
                     __सुमित्रानंदन पंत


साहित्य 'सुधा'(34/60/चतुर्थ)(मुल्यांकनकर्त्ता)

वीररस
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर


संगीता गोविल, पटना

शीर्षक - कलम या कि तलवार

दो में से क्या तुम्हें चाहिए, कलम या कि तलवार, 
मन में ऊँचे भाव कि तन में, शक्ति अजेय अपार। 


अभिलाषा कुमारी 👈 नेतृत्व

हूँकार

जेठ हो कि हो पूस
हमारे कृषकों को आराम नहीं
छूटा कभी संग बैलों का 
ऐसा कोई याम नहीं। 


भावना कुकरेती, हरिद्वार

(रश्मिर थि, तृतीय सर्ग से) 

वर्षों तक वन में घूम-घूम
बाधा बिघ्नों  को चूम-चूम
स ह धूप घाम पानी पत्थर
पांडव आये कुछ और निखर।



साहित्य 'मंजरी'(40.2/60/प्रथम) -(मुल्यांकनकर्त्ता)

प्रसंग- आशाओं के दीपक

रामधारी सिंह "दिनकर"
रचना -   "आशा का दीपक" 
पाठ कर्ता - प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र'

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है।।


अमृता सिन्हा, पटना👈 नेतृत्व

हरिवंशराय बच्चन
"है अँधेरी रात पर दीवा जलाना कब मना है?" 

कल्पना के हाथ से कमनीय जो मंदिर बना था
भावना के हाथ ने जिसमें वितानों को तना था।


रवि श्रीवास्तव, पटना
 गोपाल सिंह नेपाली
 "यह दीया बुझे नहीं" 

घोर अंधकार हो,
चल रही बयार हो,
आज द्वार–द्वार पर यह दिया बुझे नहीं
यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है ।


डॉ. पूनम देवा, पटना
गोपालदास "नीरज"
"अंधियार ढल कर ही रहेगा"

आँधियाँ चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो
अंधियार ढल कर ही रहेगा।


साहित्यिक 'स्पर्श'(30/60)-(मुल्यांकनकर्त्ता)

प्रयाण गीत

जयशंकर प्रसाद
राजकांता राज, पटना

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती -
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती -
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो।


नूतन सिन्हा, पटना
झाँसी की रानी
सुभद्रा कुमारी चौहान

बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
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लेख्य-मंजूषा की मासिक पद्य गोष्ठी में सदस्यों ने अपनी रचना के पाठ के स्थान पर वरिष्ठ साहित्यकारों की रचना का पाठ किया।
आज के कार्यक्रम में चार-चार सदस्यों को पाँच अलग-अलग दल में बाँट दिया गया था। हर दल का अपना विशिष्ठ नाम और हर दल का एक नेतृत्वकर्ता था। पहला दल ‘साहित्य सीपियाँ’ के नेतृत्वकर्ता राजस्थान के राजेन्द्र पुरोहित थे। दूसरा दल ‘साहित्य वीथिका’ की नेतृत्वकर्ता पूनम (कतरियार) थी। तीसरा दल ‘साहित्य सुधा’ की नेतृत्वकर्ता अभिलाषा कुमारी थी। चौथा दल ‘साहित्य मंजरी’ की नेतृत्वकर्ता अमृता सिन्हा थी। पाँचवा व अंतिम दल ‘साहित्य स्पर्श’ की नेतृत्वकर्ता ज्योति स्पर्श थी।
कार्यक्रम की मुख्य विशेषता यह रही हर दल के नेतृत्वकर्ता से साहित्य से सम्बन्धित सवाल भी पूछे गये। सावलों के जवाब और काव्य पाठ के ढंग पर “साहित्य मंजरी" दल प्रथम स्थान पर रही। इस दल की नेतृत्वकर्ता पटना की अमृता सिन्हा जी थी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पटना के वरिष्ठ कवी घनश्याम जी ने कहा कि कोरोना के बिगड़े माहौल में साहित्य ही वह चीज़ है जिससे मनुष्यों को मानसिक संतुष्टि मिल सकती है। लेख्य-मंजूषा ने ऑनलाइन गोष्ठियों की शुरुआत कर के इस आपदा को साहित्यकारों के लिए अवसर में बदल दिया है। इसके अतिरिक्त उन्होंने तमाम उन वरिष्ठ साहित्यकारों के जीवन के बारे में बताया जिनकी आज रचना का पाठ हुआ था।
कार्यक्रम में दुसरे मुख्य अतिथि डॉ। रविन्द्र सिंह यादव ने कोरोना काल में बरती जाने वाली सावधानियों पर अपने विचार उत्पन्न किये इसके साथ ही उन्होंने कहा कि साहित्य जीवन के लिए अमृत है।
ऑनलाइन कार्यक्रम का मंच संचालन अमेरिका से संस्था की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव ने किया और उनके सहयोगी की भूमिका में उप-सचिव संजय सिंह रहें।

धन्यवाद ज्ञापन संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष रंजना सिंह ने किया।




Sunday, June 21, 2020

पिता-दिवस के अवसर पर लेख्य-मंजूषा का त्रैमासिक कार्यक्रम

साहित्यिक स्पंदन पत्रिका (अप्रैल-जून 2020) का लोकार्पण और गद्य पाठ वर्चुअल गोष्ठी में सम्पन्न

प्रस्तुतकर्ता :- अभिलाष दत्ता (उप-सचिव)


कार्यक्रम के शुरुआत होने के बाद संस्था की पत्रिका “साहित्यक-स्पंदन" (अप्रैल-जून 2020) का लोकार्पण हुआ। इस बार की पत्रिका काव्य कोष के संचालक राहुल शिवाय जी के देखरेख में दिल्ली में प्रकाशित हुई है। पत्रिका पर रौशनी डालते हुए राहुल शिवाय जी ने कहा कि “पत्रिका बहुत खूबसूरत बन पड़ी है। पितृ दिवस पर अत्यधिक रचनाओं के साथ-साथ वर्तमान में जो घटनाएं सब हुई है उन सब पर कुछ-न-कुछ रचना पत्रिका में छपी है।"



पितृ दिवस के शुभ अवसर पर संस्था लेख्य-मंजूषा ने पिता पर आधारित लघुकथा पर “अंतरराष्ट्रीय लघुकथा समीक्षा 2020" का आयोजन किया गया था। जिसमें 62 प्रतिभागियों द्वारा लिखित समीक्षा शामिल हुई। इन तमाम लिखित समीक्षाओं के समीक्षक अल्मोड़ा उत्तराखंड से वरिष्ठ साहित्यकार खेमकरण सोनम जी थे। खेमकरण सोनम जी ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि समीक्षा के लिया अच्छी लघुकथा का चुनाव कर लेना आधी जंग जीत लेना जैसा होता है।
इन 62 समीक्षाओं में प्रथम स्थान पर अर्चना रॉय जी रही, उन्होंने लघुकथाकार रामेश्वरम हिमांशु कम्बोज जी की रचना “नवजन्मा" पर समीक्षा लेखन की थी। द्वितीय स्थान पर संस्था की पूनम कतरियार जी रही। पुनम कतरियार जी ने रामेश्वरम हिमांशु कम्बोज जी की लघुकथा “ऊँचाई" पर समीक्षा लिखी थी। तृतीय स्थान पर संस्था की मीनू झा जी रही, उन्होंने लघुकथाकार कुमार गौरव जी की रचना “निष्ठर" पर समीक्षा लेखन की थी। वहीं तृतीय स्थान मीनू झा के संग राधेश्याम भारतीय जी को भी प्राप्त हुआ वह लघुकथाकार माधव नागदा जी लघुकथा “पुराना दरवाजा" पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत किये थे।
इन 62 समीक्षा की पुस्तक जल्द ही लेख्य-मंजूषा संस्था के तरफ से प्रकाशित होने वाली है।

फ़िल्म मैं ऐसा ही हूँ की गीत
चँदा ने पूछा तारों
तारों ने पूछा हजारों से
गाती माया शनॉय श्रीवास्तव


“पिता पत्थर है, जरा हटकर रहे,
वह सुबह-शाम भटकते रहे,
वह हमेशा-हमेशा खटकते रहे,
अम्मा से अलग भटकते रहे।
देखा एक दिन तो पाया,
वह अपने राम-राम को
जन्म भटकते रहे।।”
उक्त पंक्तियाँ दार्शनिक कवि आदरणीय “राश दादा रास" ने साहित्यक संस्था “लेख्य-मंजूषा" के ऑनलाइन त्रैमासिक कार्यक्रम में कहा। लेख्य-मंजूषा के इतिहास में यह पहला मौका था जब त्रैमासिक कार्यक्रम ऑनलाइन एप्प ज़ूम व गूगल मीट के जरिये सम्पन्न हुई।
पितृ दिवस पर आयोजित गद्य त्रैमासिक कार्यक्रम पूर्णत पिता को समर्पित रही। इस ऑनलाइन कार्यक्रम में कैलिफ़ोर्निया अमेरिका से नीलू गुप्ता जी ने पिता के बारे में कहा कि पिता नारियल की तरह ऊपर से कठोर और अंदर से नर्म होते हैं। उन्होंने अपनी रचना का पाठ करते हुए कहा कि “माँ-पिता एक समान, मैं किसे करूँ प्रथम प्रणाम? मैं दोनों को करूँ एक साथ प्रणाम।”
कार्यक्रम में उपस्थित पटना के वरिष्ठ कवि घनश्याम जी ने कहा कि ईश्वर पर लिखना सरल है, किंतु माँ-पिता पर कुछ भी लिखना अत्यंत कठिन है। माँ-पिता का दर्जा ईश्वर से भी ऊपर है।
कार्यक्रम में उपस्थित विदुषी साहित्यकार आदरणीय डॉ. अनीता राकेश ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि “कठोर आवरण के भीतर शुद्ध सात्विक निर्मल जल , श्वेत दल युक्त पिता के इस स्वरूप का दिग्दर्शन जब  होता है तो चौंकाने वाला ही होता है | यह मौन रह कर गरल पान करने वाला  वह नीलकंठी शिव है जो सदैव पूजित नहीं होता |धीरता की पाषाण प्रतिमा बन काल के प्रहार का सामना करता पिता का व्यक्तित्व समस्त व्रणों का हलाहल आत्मसात् करता जाता है।”
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आज के कार्यक्रम को दो सत्रों में बाँटा गया था। प्रथम सत्र का आयोजन ज़ूम एप्प और द्वितीय सत्र का आयोजन गूगल मीट एप्प पर किया गया।
प्रथम सत्र की शुरुआत करते हुए संस्था की अध्यक्ष विभा रानी श्रीवास्तव जी ने अमेरिका से लाइव होते हुए पितृ दिवस पर कहा कि “माँ होना जिस दिन सुनिश्चित हो जाता है उस दिन से पिता होना भी तय होता है.. । आज भी समाज में पुरुष की जिम्मेदारी होती है घर, पत्नी व बच्चों का हर तरह से ख्याल रखना। पति के रूप में थोड़ा कमजोर भी हो सकता है परन्तु पिता के रूप में सशक्त इंसान होता है। पिता के प्रति हर बच्चा ऋणी होता है। आभार प्रकट करने के लिए सम्मान देने के लिए एक दिन निर्धारित नहीं किया जा सकता है। हम प्रति पल उनके प्रति अपने दायित्व को निभाने का प्रयत्न करते हुए उनका सम्मान करते है इसका विश्वास दिलाने की चेष्टा करते हैं।"
आज के कार्यक्रम का संचालन पटना के मशहूर शायर मो. नसीम अख्तर जी ने किया।
धन्यवाद ज्ञापन युवा उपन्यासकार अभिलाष दत्ता ने किया।
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कार्यक्रम में उपस्थित सुधीजनों के रचना के दो-दो पंक्ति :-
भगवती प्रसाद द्विवेदी : पिता:
संतान की बरगदी छाँव पिता, जो चिलचिलाती दोपहरी में लू के थपेड़े झेलता जीवन-संग्राम में 
मुस्तैद सैनिक की भूमिका अदा करता है, पर संतान की हर मुमकिन सुख-सुविधा की शीतल छाँव के लिए अपनी जान की बाजी लगा देता है ।संतान को उसके न रहने पर उसकी 
अहमियत का पता चलता है ।हम पिता के जीते जी उनका सम्मान करना कब सीखेंगे?
सतविन्द्र कुमार राणा : नजदीक की दूरी
पिताजी आगे बोले,"तू सँभाल अपने पोते-पोतियों को और मैं सँभालूँ भैंसों को।"
दोनों के होठों पर मुस्कान और आँखों में  विवशता झलक रही थी।
पिता जी चले गए। माँ बड़बड़ा रही थी,"बड़े परिवार में बड़े,पास रहते हैं, पर एक साथ नहीं।"
मंजू मिश्रा: पिता
सघन वट वृक्ष सी छाया बन 
सिर पर तने रहते हैं पिता 
वक्त की आँधियों के सामने 
ढाल बन कर अडिग खड़े रहते हैं पिता..
सुषमा खरे : ''पिताजी हमारे लिए भगवान है''
 पिता हर बच्चे के लिए इस धरती पर ईश्वर का रूप होते हैं।
हर पिता अपने बच्चों का भविष्य संवारने के लिए दिन-रात मेहनत करता है।
बच्चों की हर छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए आवश्यकता से अधिक चिंतित रहता है।
श्रुत कीर्ति अग्रवाल : नई पीढ़ी की नई सोंच 
स्नेहा के पापा की तबियत खराब होने की खबर न आती
तो वो येन केन प्रकारेण  अभी कुछ दिन और यहीं रुके रहने का
जतन कर ही लेतीं। दो महीने की इस नन्ही सी जान को
छोड़ कर जाने की उनकी हिम्मत ही नहीं हो रही थी।
मधुरेश नारायण : "मेरे बाबूजी"
ऐसा क्यूँ होता है,जब लोग नहीं रहते हैं?
उनकी कमी ,उनके प्यार के लिये तरसते हैं।
नूतन सिन्हा : जब मैं छोटी थी
मैं करीब 12 साल की थी तो मेरी हालत अब तब में थी
बहुत बीमार थी तो डॉकटर स्वामी नन्दन से मेरा इलाज चल रहा था
उस वक्त पापा (पिता जी )मेरे सिरहाने पास बैठकर
हर वक्त दुर्गा चालिसा का पाठ किया करते थे ।
डॉ. पूनम देवा : वक्त
हाँ, मैं आ रहा हूँ बेटा ! अब मैं अपने आख़िरी वक्त
अपनी पोती और तुम्हारे साथ हीं बिताऊंगा।
पूनम (कतरियार) : पिता की ममता
" जब पिता में माँ  की ममता बस जाती है तो 
ईश्वर का स्वरूप साकार हो जाता है।
सीमा रानी : पुरानी 
आज सुबह आँख खुली तो घर की शानदार सजावट देखकर मै हैरान रह गयी।
कोई आने वाला है क्या, पापा?
पापा एक हल्की मुस्कराहट के साथ आगे बढ़ गये।
माँ के जाने के बाद इस घर का सन्नाटा काटने को दौड़ता था।
कुमार गौरव : फटा नोट
"जिम्मेदारी.."
" हाँ$$ बताता तो कुछ कहीं से बरतन भांडे बेचकर फार्म तो भरवा ही देते ।
इनको लगता है लोग किताबें पढने से ही आदमी बनते हैं।"
राजेन्द्र पुरोहित : मैं हूँ न बेटा
पिताजी को गये आज एक महीना हो गया था। असीम का रो-रो कर बुरा हाल था।
मित्र व रिश्तेदार समझा-समझा कर हार गये, लेकिन असीम माने तब न।
और यों देखिये, तो रोने की वजह भी वाजिब थी।
संगीता गोविल : मुखिया
अजय का रो-रो कर बुरा हाल था । इतना तो वह अपने पिता की मृत्यु पर भी नहीं रोया था ।
उस घर का वह मामूली-सा नौकर था। लेकिन बचपन से
अजय व घर के अन्य बच्चे पिता से ज्यादा उसकी बात मानते थे।
रविन्द्र कुमार:पिता
"अपनी रोजी को कोई लज्जित होता हुआ नहीं देखता, 
पैर के अँगूठे से इशारा करके बताना मुझे अच्छा नहीं लगा।"
"सॉरी अंकल।"कहता हुआ समीर साइकिल के पैडल पर पाँव रखता है
और गंभीर होकर स्वाभिमान-अभिमान पर चिंतन करता हुआ कॉलेज पहुँच जाता है|"
रंजना सिंह : पिता दिवस
    पिता परिवार का आदर्श होता है।बच्चे अपने पिता का
सबसे ज्यादा अनुसरण करते हैं। पिता के आशीर्वाद के
छाया में पूरा परिवार पुष्पित एवं फलित होता है।
अमृता सिन्हा : मज़बूत कंधे
क्या पापा? कितना समझाया था आपको?
फ़िर भी आपने केस वापस नहीं लिया अब तक?
दीदी के जाने का दुःख हम सभी को है।
पर उसकी बेटी के पालन-पोषण का भार
उसके ससुराल वालों पर ही रहने दीजिए ना।"
कवि घनश्याम : "पिता होना"
माँ अपनी संतानों के लिए होती हैं आधारशिला
जबकि पिता होते हैं अभियंता । जो न केवल तैयार करते हैं
उनके भविष्य की रूप रेखा बल्कि उस पर सतत करते रहते हैं।
निर्माण कार्य मजबूत गारे से ईंट दर ईंट और माताएं उसपर करती रहती हैं 
ममता के जल का छिड़काव ताकि उस संरचना का क्षरण नहीं हो चिरकाल तक.
रवि श्रीवास्तव : पिता का प्यार
"हूंह! पापा हमेशा ऐसा ही करते हैं।
देखो मम्मी कैसा घटिया-सस्ता मोबाइल लाए हैं मेरे लिए।
इतना भी नहीं सोचा कि इतने बड़े काॅलेज में पढ़ने जा रहा हूँ ।
क्या इज्जत रहेगी सबके बीच।"
उपेंद्र प्रताप सिंह : सपनों का मोल
महत्त्वकांक्षी बेटे के सपनों बारे में पिता का
सबसे बड़ा डर सच हुआ तो पिता कैसे टूट गया

अगला त्रैमासिक आयोजन सितम्बर में होगा
और त्रैमासिक पत्रिका के लिए
रचना भेजने की अंतिम तिथि 30 जून 2020


Sunday, June 7, 2020

फेसबुक-पेज-साप्ताहिक विवरण

'सहारा'-राजेन्द्र पुरोहित/प्रस्तुति एडमिन/अभिलाष दत्ता
           बंसी का लटका चेहरा बता रहा था कि सेठ जी ने जवाब दे दिया है। लच्छो रुआँसी हो गयी। धीरे से बोली,"चलना पड़ेगा ना हमें भी? मुंबई से गाँव तक पैदल कैसे चलेंगे? फिर मुन्ना भी तो साथ है।"
                    बंसी की आँखें भर आईं, भरे गले से बोला,"मालिक का काम भी तो बन्द है। जब चला, तो तनख्वा-बख्शीश सब दिया। अब धंधा नहीं, तो कैसे देंगे?" भारी मन से दोनों ने सामान बाँधा और कुछ खाने का सामान भी ले लिया। मुन्ना को गोद में उठाये रवाना होने लगे, तो लच्छो की रुलाई फूट पड़ी।
        बंसी ने समझाया,"रो मत पगली। जिसने ये दिन दिखाये, वो ही इन्हें दूर करेगा।" सामने एक टोली जाती दिखी, तो दोनों ने कदम बढ़ाये ही थे कि सामने सेठ व सेठानी को देख कर ठिठक गये।
                   बंसी ने अचरज से पूछा, "सेठ जी आप?"
सेठ जी ने कहा,"तूने ठीक कहा बंसी। जिसने कष्ट दिये, वही इन्हें दूर भी करेगा। तुझे मना करने के बाद मुझे बहुत दुःख हुआ। तकलीफ़ में बेसहारा छोड़ना तो नीचता होती।"
        सेठानी ने बात पूरी की,"धंधा नहीं है तो क्या, तनख्वाह बाद में दी जा सकती है। लेकिन दो जून की रोटी की तो कोई कमी नहीं। मत जाओ। आज नहीं तो कल धंधा चालू हो ही जायेगा। इतने वर्षों का साथ है, ऐसे मझधार में कैसे छोड़ दें, तुम दोनों को। जा री लच्छो, सामान अंदर रख दे और मुन्ना के लिये दूध ले जा आ कर।" बंसी भीगी आँखों से आसमान की तरफ़ देखने लगा।

'उम्र के रास्ते'-अमृता सिन्हा/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्त
 
उम्र के रास्ते गुज़रते
जाने कब, क्या-क्या
पीछे छूटता गया...!
वहीं तो खड़े हैं अब भी,
वो दरो-दीवार।
लेकिन खो गयी तो सिर्फ़
मेरी वो खिड़की, और
उस खिड़की से झांकता
एक टुकड़ा आसमां।
जाने कहाँ रह गयी
बारिश से भीगी शामें।
वो ठंडी सुहानी हवा,
साँसों में उतर आती
वो मिट्टी की ख़ुशबू।
अंधेरो में टिमटिमाते
ख़्वाहिशों के जुगनू,
वो तन्हाई की महफ़िल।
और पहरों की सुख़न,
हर आह पे दिल की
बे-बात ही चुभन।
जाने कहाँ खो गया
ज़िंदगी का वो हर लम्हा,
अब तो हर पल, उम्र
यूँ तमाम हो रही है।
किसे ख़बर, कब सुबह
कब शाम हो रही है !!

'मीरा'-श्रुत कीर्ति अग्रवाल/प्रस्तुति- एडमिन अभिलाष दत्ता
शुरुआत में, जब उसके देह का आकर्षण सर चढ़ कर बोलता था तब उसको अपनी पत्नी होने के बावजूद, कुछ संयुक्त परिवार के सैकड़ों बंधनों और कुछ उसके मितभाषी स्वभाव के कारण उसे उससे मिलने-बतियाने के अवसर थोड़े कम ही मिला करते थे।  फिर जब बच्चे बड़े होने लगे, वे हर महीने खर्च के लिये उसके हाथ में पैसे पकड़ाते हुए पता नहीं कब घर के वो रोबदार मुखिया बन गया जो हर समय अत्यंत व्यस्त रहता था और घर के लोगों से बराबरी के स्तर पर बात करना उसकी शान के विरुद्ध था। 
        वो तो अब सेवा-निवृत होने के बाद, जब जीवन में साँझ गहराने लगी है, उसको अपनी मीरा और बच्चों पर ध्यान देने का समय मिला है। अब उसको याद आया है कि वह कम भले ही बोलती हो, पर न कभी झूठ बोलती है और न सच बोलने से डरती है। वो सारे दिन कड़ी मेहनत करती है पर शिकायत कभी नहीं करती और सबसे बड़ी बात... बिना उससे कोई खास मदद माँगे, अकेले अपने दम पर उसने परिवार और बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ सँभाल लीं थीं  और जब तक उसका ध्यान इस तरफ जाता, सबके सब अपने-आप में व्यस्त हो चुके थे।
       इधर वो महसूस करने लगा है कि वो तो अपनी मीरा से बहुत प्यार करता है, उसका साथ चाहता है और उसको खोने से उसको डर लगता है। अब अफसोस होता है कि उसने अभी तक इस प्यार को कभी जताया क्यों नहीं? उसके लिये कभी कुछ किया क्यों नहीं ! मानसिक तौर पर उन दोनों के मध्य इतनी दूरी क्यों है?
     उसका हाथ पकड़ कर बैठा लिया था उसने और आँखों में आँखें डाल कर पूछा था... "तुमने आजतक कभी मुझसे कुछ नहीं कहा! आज हमारी शादी की सालगिरह के दिन मैं चाहता हूँ कि तुम मुझसे कुछ माँगो।"
     वह अविश्वास भरी नजरों से उसको देख रही थी पर जब वो इसरार करते ही रहा तो बोली,"साकेत भवन के पीछे वाले कमरे में जो सदानंद बाबू रहते हैं, वो आजकल बहुत बीमार रहने लगे हैं। उनके इस आखिरी समय में मैं उनकी सेवा करना चाहती हूँ।"
           वह चौंक उठा... "वो बूढा? आधा पागल? तुम भला उसे कैसे जानती हो?"
थोड़ा हिचकिचाई जरूर थीं मीरा, पर उसे मिथ्या बोलना कहाँ आता था... "वह हमारा पड़ोसी था! हम आपस में शादी करना चाहते थे! मेरी वजह से ही उसकी ये दशा हुई है।"
पता नहीं कब, उसके हाथों पर से उसकी पकड़ ढीली हो गई थी।

"ग्रीष्मऋतु"-अंकिता कुलश्रेष्ठ/प्रस्तुति - एडमिन - अभिलाष दत्ता

शुष्क,तपता वसुधा का गात
बरसती अग्नि झुलसते पात
लुप्त सा जीवन का उल्लास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास
रक्तवर्णी मुख मंडल तप्त
दहकते नख-शिख-केश-कपोल
म्लान उर मुरझाए ज्यों पुहुप
सुलगते गोरी के मधु बोल
हृदय प्रियतम का हुआ उदास।
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
ओढ़कर धरा हुई बेहाल
धूप की चादर चारों ओर
कर रहे पावस का आह्वान
टिटहरी दादुर मोर चकोर
क्लांत सब प्राणी करते आस
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
डगर सूनी हैं सूने खेत
गगन से टपक रहे अंगार
ताल में करते बाल किलोल
ताप का प्राकृतिक उपचार
मद भरा रवि का अट्टहास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
दिवस यों बीतें,लगें पहाड़
स्वेद तर व्याकुल आकुल देह
पुष्प मुख उतरे उपवन शांत
तितलियाँ,कोयल बैठीं गेह
लुप्त कलियों अलियों का हास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
आम ककड़ी खीरा तरबूज
ग्रीष्म के शीतल ये उपहार
कुंभ-जल लगता जैसे सोम
लपट सी लगती गर्म बयार
स्वप्न दुर्लभ लगता मधुमास
ग्रीष्म ऋतु का आया है मास।
चले नानी-नाना के गाँव
ग्रीष्म अवकाशों का आनंद
बालकों का मनभावन माह
लग रहे ग्रीष्म थपेड़े मंद
गगन में तारे थाल बतास

ग्रीष्म ऋतु का आया है मास

"देशहित"-डॉ. पूनम देवा/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता
“माँ!  मैं आ गया हूँ ,दरवाजा खोल।” खट-खट की आवाजें माँ के कानों पर हथौड़े  सी पर रही थी।
माँ ने अपनी बेचैनी‌ पर  काबू  रख‌ कर कहा -  “बेटा पहले तुम चौदह दिनों के लिए सरपंच जी के बनाए क्वारंटाइन-सेंटर में चले जाओ। उसके बाद हीं मैं तुम्हें घर में आने दूंगी”।
“माँ मेरा  तो जगह-जगह टेस्ट हुआ है, और मैं बिल्कुल स्वस्थ हूँ।”
“ना बेटा  ना, तू मुम्बई से आ रहा है, सुना है सबसे ज्यादा लोगों को यह कोरोना बीमारी वहीं लगी हुई  है। इसलिए सरकार ने जो नियम बनाए हैं,  तू भी पहले उसका पालन कर लें। चौदह दिनों के बाद ही मैं तुम्हारे लिए इस घर के दरवाजे खोलूँगी।”
माँ से मिलने को व्याकुल मन, पर धैर्य रख बेटा विद्यालय की ओर बढ़ गया। पढ़ें-लिखे बेटे को अपनी असाक्षर माँ पर गर्व हो रहा था कि आज  उसकी माँ ने पुनः एक सुन्दर सीख दी है ‘जागरूकता की ओर देशहित की। आज समय की यही तो माँग है, हम सब जागरूक रहें और अपने से ज्यादा देशहित को प्रार्थमिकता दें।’

विनती-मधुरेश नारायण/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता

यूँ मिटते अपनी रचना को तो तुम देख नहीं सकते।
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
बड़े जतन से की है तुमनें इस सृष्टि की रचना।
सदा चलायमान,रहे बदलती इसकी संरचना।
कहाँ दानव कहाँ मानव,ऐसा तुम देख नहीं सकते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
ये सृष्टि फल-फूल रही यहाँ पे युगों-युगों से रब।
कभी जलजला कभी सुनामी,बनते दानव जब तब।
सदा मानव विजयी रहा,पीठ पर तुम,सभी कहते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।
विकराल रुप धर के दानव फिर आया इस धरा पर।
विकल है मानव इसके चंगुल से छुटने को,जहाँ पर।
सृजन को बचाने आओगें तुम,  इंतजार  करते...
कमजोरी का पुतला है मानव,यूँ फेंक नहीं सकते।

मजदूर"-सुधा पाण्डेय/प्रस्तुति एडमिन - अभिलाष दत्ता

मजदूरों की जिन्दगी,
लगती कितनी दरिंदगी,
बन्धी हुई है डोरों में,
डोर है जड़ से जुड़ी।
देखा! मजदूरों को,
अपनी कहानी कहते हुए,
बिना जुबाँ के सहते हुए,
रास्तों को तय करते हुए,
अपनों से बिछुड़ते हुए।
अपने गाँवों को छोड़,
चले थे काम खोजने,
चलते रहे हर दिन,
दूरियाँ तय करते रहे,
मंजिलें तलाशते रहे।
खाने को रोटी नहीं,
जो था,वह खत्म हुआ,
कल के लिए मन में सोचा,
थके पाँव मन को कोसा।
भूखे-प्यासे निकल पड़े,
मंजिल तक पहुंच सके,
राह में कई बिछड़े राही,
छोटी साहस दिखा गई,
बापू को घर पहुँचा गई
यह था दो पहिए का कमाल,
बाहदूरी का था मिसाल,
भारत माता की जय,
जय भारत,जय हिन्द ,                   

का नारा  वह लगा गई।

"अजीब है जिन्दगी"-उर्मिला वर्मा/प्रस्तुति एडमिन मधुरेश नारायण

कभी अजीब अकुलाहट दिल में उभरती है।
मैं गहराई में जाना चाहती हूँ।
जाने कब-कौन-कहाँ किस ओर मिल जाये।
कदम-कदम पर चौराहे मिलते,
और हर दिन मिलती सौ राहें,।
बाहें पसार इन्तजार करती
शाखा-प्रशाखाएं निकलती रहती हैं।
नए-नए  रूप के अनेक विषय हर दिन मिलते हैं।
चौराहे पर खड़े हो कर कुछ बातें करती हूँ।
...बस!उपन्यास बन जाते हैं...।
अलंकार-विश्लेषण, चारित्रिक-व्याख्यान, दुखों की कथाएं,
तरह-तरह की शिकायतें, जमाने की
जानदार सुर सुनने को मिलते हैं।
घर में भी पग-पग पर चौराहे मिलते बाहें फैलाए..,
हर दिन मिलती सौ राहें,
मैं सबों से गुजरना चाहती हूँ।
उनके तजुर्बे और मेरे स्वप्न सब सत्य लगते रहते।
ऐसा जान पड़ता प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीड़ा।
पल भर में मैं सबों से गुजरना चाहती।
सबों के ह्रदय पटल में बसना चाहती।
सब तरफ अपने को लिए फिरती रहती।
और मजा तब आता जब मैं ठगी जाती हूँ।
अजीब है यह जिन्दगी।
मैं सोंच रही हूँ,
अपने जीवन की कुछ गाथा लिखूँ।
विषयों की कोई कमी नहीं,
बस ठीक चुनाव ही नहीं कर पाती हूँ!


प्रस्तुति :: मो. नसीम अख्तर

  जो संस्था के सदस्य नहीं हैं ऐसे किसी साहित्यकार या कवि की कोई रचना उनके परिचय के साथ लेख्य-मंजूषा के पेज पर पोस्ट किया जाएगा, ताकि सदस्यों को कुछ जानने एवं सीखने का मौका मिले।
      इस कड़ी में आज पेश है देश की मशहूर उपन्यासकार, लेखिका और कवियत्री आशा प्रभात जी के संक्षिप्त परिचय के साथ एक कविता।
       मोहतरमा आशा प्रभात जी का जन्म 21 जुलाई 1958 को बिहार के नरकटिया बाजार, पूर्वी चंपारण ज़िला में हुआ।लेखन में ये हिन्दी एवं ऊर्दू में समान रूप से अधिकार रखती हैं।इनकी रचनाओं का प्रकाशन न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी हिंदी - ऊर्दू के स्तरीय पत्र पत्रिकाओं निरंतर प्रकाशित होता रहा है तथा आकाशवाणी और दूरदर्शन से प्रसारित भी होता रहता है।
प्रकाशित कृतियाँ -
*हिन्दी एवं ऊर्दू में 16 पुस्तकें।
*पाँच उपन्यास "धुँध में उगा पेड़"   " जाने कितने मोड़ " "मैं और वह" "गिरदाब " और "मैं जनक नंदनी"।
 *चार कहानी संग्रह, दो काव्य संग्रह।कई किताबें हिन्दी से ऊर्दू एवं ऊर्दू से हिन्दी में अनुवादित।उपन्यास "मैं और वह "हिन्दी, उर्दू के अलावा तेलगु में अनुदित व प्रकाशित ।कहानी "एक्वेरियम " भारत के मान्यता प्राप्त लगभग सभी भाषाओं में प्रकाशित। चर्चित उपन्यास "मैं जनक नंदनी" पर कई विश्वविद्यालय में विधार्थीयों द्वारा शोध किया गया।आइ.ए.एस के प्रश्न पत्र में दो बार रचनाओं को स्थान प्राप्त।
सम्मान एवं पुरस्कार -
दरीचे के लिए 'काव्य संगम पुरस्कार '। धुँध में उगा पेड़ के लिए 'प्रेमचंद सम्मान। राष्ट्र भाषा परिषद द्वारा' 'साहित्य सेवा सम्मान' । दिनकर सम्मान। बिहार ऊर्दू अकादमी द्वारा 'सुहैल अज़ीमाबादी अवार्ड व खसूसी अवार्ड '। ए.बी.आई द्वारा 1998 वुमन आॅफ द इअर अवार्ड एवं दर्जनों राष्ट्रीय अवार्ड।
       पेश है उनकी एक बेहतरीन और लोकप्रिय कविता।

"मेरी बच्ची!"
                                         
मेरी बच्ची !
जिस दिन से
मेरी कोख में
तुम्हारी साँसों ने
धड़कना शुरू किया है
कुछ लोगों की नींदे
उड़न छू हो गयी हैं
क्या गज़ब की बात है
इक्कीसवीं सदी में जीने
और चाँद, तारों तथा
मंगल ग्रह तक को
रौंदने वाला इंसान
तुम्हारे नन्हें से वजूद से डर गया है
अंधेरे कमरों में हो रही है
तुम्हें मिटाने की साजिशें
तुम्हारे दादा,ताऊ और पिता
आंँखे बंद किये सोचों में गुम हैं
शायद उनकी बंद आंँखो में
स्वर्ग न पहुंँच पाने का
भय व्याप्त है
या फिर तर्पण बगैर
सूखता गले का डर
पर मेरी बच्ची!
उनके स्वर्ग की तमन्ना पर
तुम्हें मिटा कर
मैं नर्क की यातना नहीं झेलूँगी
तमाम विरोधों के बावजूद
मैं तुम्हें जन्म दूंगी और
इस धरती पर तुम्हें
परवान चढ़ने का अधिकार  भी ۔۔۔।


"धरोहर"प्रस्तुति :: मो. नसीम अख्तर

जैसा कि आप सभी सदस्यों को जानकारी है  कि प्रत्येक शनिवार को भारत के किसी दिवंगत साहित्यकार या कवि की कोई रचना के साथ उनके बारे में विस्तृत जानकारी लेख्य-मंजूषा के पेज पर पोस्ट की जाती है। इस कड़ी में आज पेश है राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता के साथ उनके बारे में विस्तृत जानकारी। 
         'दिनकर' जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में बीए किया। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक विद्यालय में अध्यापक हो गये। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से 1952 तक मुजफ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया और उसके बाद भारत सरकार के हिन्दी सलाहकार बने।
        उत्तरप्रदेश सरकार और भारत सरकार से भी सम्मान मिला। संस्कृति के चार अध्याय के लिये उन्हें 1959 में साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें 1959 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया। भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। गुरू महाविद्यालय ने उन्हें विद्या वाचस्पति के लिये चुना। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया। वर्ष 1972 में काव्य रचना उर्वशी के लिये उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया। 1952 में वे राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।
         उन्हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। अपनी लेखनी के माध्यम से वह सदा अमर रहेंगे। द्वापर युग की ऐतिहासिक घटना महाभारत पर आधारित उनके प्रबन्ध-काव्य कुरुक्षेत्र को विश्व के 100 सर्वश्रेष्ठ काव्यों में 74वाँ स्थान दिया गया।
         उनकी प्रसिद्ध रचनाएं उर्वशी, रश्मिरथी, रेणुका, संस्कृति के चार अध्याय, हुंकार, सामधेनी, नीम के पत्ते हैं.
         उनकी मृत्यु 24 अप्रैल 1974 को हुई ।
            ✒️कलम या कि तलवार⚔️

दो में से क्या तुम्हें चाहिए कलम या कि तलवार 
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार
अंध-कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली, 
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली 
पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, 
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे 
एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी, 
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी 
जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले, 
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले 
जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार, 
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार
     अगले शनिवार एक नये साहित्यकार /कवि के साथ पुन: हाज़िर रहूँगा। 

     


अक्षर अंगारे, शब्द ज्वाल,
स्वर टंकार, भयभीत काल।
प्रकम्पित-से, पर्वत गह्वर,
प्रवहमान कविता निर्झर।
रामेश्वरम का सागर तट,
उड़ेला रश्मि रथी का घट।
उछली उर्मी, उल्लसित धार
पुलकित पयोधि, न पारावार।
अहके अर्णव, क्या दूँ मैं वर?
करबद्ध कोविद, कहें कविवर।
थाम जलधाम, ये शब्द वीणा
मृत्यु दक्षिणा, मृत्यु दक्षिणा!
नि:सृत नयनन, नीरनिधि नीर
उठे उदधि उर लिए चीर।
मुख लाल क्षितिज किये रत्नाकर
समेटे रश्मि, डूबे दिवाकर।
कालजयी कवि अजर-अमर
नमन दिनकर, नमन दिनकर